भावार्थ:
तामस मनुष्य शरीर में ही सम्पूर्ण रूप से आसक्त रहता है। वह नष्ट होने वाले अपने पञ्च भौतिक शरीर को ही अपना स्वरूप मानता है।
अध्याय १८ श्लोक २० में जिस ज्ञान को सात्विक ज्ञान कहा है। अध्याय १३ श्लोक ११ में जिस ज्ञान को “यह ही ज्ञान है” ऐसा कहा है। तामस मनुष्य उस ज्ञान से रहित होता है। भगवान श्री कृष्ण वास्तविक ज्ञान के अतिरिक्त जो संसारिक ज्ञान है, वह तुच्छ ज्ञान है ऐसा कहते है। इस प्रकार के तुच्छ ज्ञान से युक्त तामस मनुष्य को क्या करना है और क्या नहीं करना है, इस विवेक (युक्ति) से वह रहित होता है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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