भावार्थ:
विषयों और इन्द्रियों के संयोग से होनेवाला जो सुख है, वह प्रथम दृष्टि अमृत के समान दिखता है।
जब मन विषयों में खींचता है, तब मनको वे विषय बड़े प्यारे लगते हैं। उन विषयों का भोग होता है। परन्तु परिवर्तन शील विषयों से प्राप्त सुख नित्य बना नहीं रहता। वह क्षणिक होता है। विषयों से वियोग होने पर दुख होता है। विषयों से वियोग होने की संभावना को लेकर दुःख होता है।
मनुष्य इस क्षणिक सुख का भी पूर्णत और यथेष्ट भोग नहीं कर पाता, क्योंकि भोगकाल में भी उसे भय और चिन्ता लगी रहती है कि कहीं यह सुख शीघ्र ही समाप्त न हो जाय।
अतः विषयों और इन्द्रियों के संयोग से होनेवाला सुख विष के समान है।
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