भावार्थ:
मनुष्य का समाज के प्रति जो स्वधर्म रूपी कर्तव्य है उसका पालन करना ही इस श्लोक में परमात्मा का पूजन है। भगवद्बुद्धि से निष्काम भाव पूर्वक समाज की सेवा, अपने स्वधर्म के द्वारा करना परमात्मा का पूजन है।
बाल्य अवस्था में अपने स्वभाव (वर्ण) के अनुसार जिस स्वधर्म (कार्य) का चयन कर, मनुष्य उसका अध्यन कर उस कार्य में निपूर्ण प्राप्त करता है उसका ही कर्तव्य रूपसे पालन करना मनुष्य का उदेश्य है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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