भावार्थ:
बाल्य अवस्था में अपने स्वभाव (वर्ण) के अनुसार जिस कार्य का चयन, और उस कार्य में अध्यन (शिक्षा के द्वारा) निपुणता प्राप्त करने पर वह कार्य मनुष्य का स्वधर्म हो जाता है। उस स्वधर्म पालन हेतु, मनुष्य के समक्ष कितना भी घोर-कठिन कार्य कियु न आ जाय, उसको करने से मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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