भावार्थ:
जो कार्य शिक्षा के द्वारा प्राप्त हुए स्वधर्म में नहीं आते, वे कार्य परधर्म है। अतः जो चिकत्सक है, उसका स्वधर्म चिकत्सा करना है। अगर चिकत्सक, खेती का काम करना चाहे तो वह उसका परधर्म है। चिकत्सा करने पर अगर किसी मनुष्य का उपचार न लगने से निधन होता है तो चिकत्सक को वेदना तो होती है परन्तु उस मृत्यु के कारण में भागी होने पर भी चिकत्सक को पाप नहीं लगता। इस के विपरीत मृत्यु की वेदना से बचने के लिये चिकत्सक अगर खेती का कार्य करने लगे तो वह अपने स्वधर्म रूपी कर्तव्य से विमुख कहलायेगा और पाप का भागी होगा।
कोई भी कार्य किया जाय, वह कार्य किसी के लिये अनुकूल और किसी के लिये प्रतिकूल होता ही है। शिक्षक जब परीक्षा में किसी विद्यार्थी को असफल करता है तो उस विद्यार्थी के लिये वह प्रतिकूल परस्थिति है जो उसको शिक्षक से प्राप्त हुई है। विद्यार्थी की दृष्टि में शिक्षक द्वारा किया गया कार्य दोष पूर्ण हो सकता है, परन्तु अगर शिक्षक ने केवल गुणवत्ता के आधार पर उस विद्यार्थी को असफल किया है और उस कार्य में अपना स्वार्थ अथवा दुवेश नहीं है तो उस कार्य में दोष नहीं है।
परधर्म के दक्षता न होने के कारण वह कार्य प्रकृति के लिये दोष पूर्ण ही है।
अर्जुन युद्ध में स्वजनों को मरने की अपेक्षा भिक्षा मांगना सरल मानता है, श्रेष्ठ मानता है। इसके लिये ही भगवान श्री कृष्ण ने यह श्लोक कहा है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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