भावार्थ:
यह महत्वपूर्ण एवं अनिवार्य है की गीता-ग्रन्थ को श्रद्धा भाव से और दोषदृष्टि से रहित हो कर सुनना अथवा पढ़ना चाहिये।
और इस प्रकार जो मनुष्य अपना जीवन व्यापन गीता-ग्रन्थ का अनुसरण करते हुए करेगा वह सभी पापों से मुक्त हो जायेगा।
मनुष्य पाप और पुण्य से तभी मुक्त है जब उसके सभी कार्य समाज कल्याण के लिये होते है, सांसारिक पदार्थों का भोग नहीं होता और कार्यों में अहंता नहीं होती।
पापों से मुक्त होकर तुम्हारा वास उस शुभ लोक में होगा जहाँ सभी पुण्यकारियों का वास होता है।
इस का अर्थ यह भी लेना चाहिये की जब सभी पुण्य कर्म करते है, तब सम्पूर्ण समाज शुभ लोक में परिवर्तित को जाता है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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