समता युक्त बुद्धि की सिद्धि किस प्रकार हो, उसकी अनिवार्यता क्यों है, और न करने से क्या होता है, इस प्रकार का प्रकरण जो अध्याय २ श्लोक ३९ से आरम्भ हुआ था, उसका उपसंहार करते हुए भगवान श्रीकृष्ण बल देते है की मनुष्य को कामना और भोगों का त्याग करके मनुष्य धर्म का पालन करना चाहिये। संसारिक जीवन में प्राप्त वस्तु से स्पृहारहित, और ममतारहित रहना चाहिये।
धर्म का पालन करने में किसी भी प्रकार का अहंकार (मैं करता हूँ – ऐसा भाव) नहीं होना चाहिये।
जिस साधक का आचरण, जीवन में इस प्रकार का होता है, वह परम् शान्ति को प्राप्त होता है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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