इस श्लोक में देह पद से शरीर और संसार, दोनों विषय आ जाते है।
प्राय जब विचार स्वयं को इन्द्रियों के विषय से अलग कर लेने का होता है, तब अनेक व्यक्ति एकान्त में बैठ जाते है। वह संसार के कार्यों का त्याग कर देते है। ऐसा करने से उनको ऐसा प्रतीत होता है कि, विषयों से वैराग्य हो गया है।
इन्द्रियों को विषय से हटा लेने से, राग-द्वेष को व्यक्त करने का कोई कारण नहीं मिलता। और मनुष्य को लगता है की उसका विषय के प्रति राग-द्वेष का त्याग हो गया है।
परन्तु क्योकि ऐसे व्यक्ति देह आसक्त होते है, इसलिये उनमें इन्द्रियों के विषय के प्रति आकर्षण बना ही रहता है। उनमें राग-द्वेष रूपी संस्कार बने रहते है। ऐसे मनुष्य विषयों का चिन्तन कर, कल्पना में ही उनका भोग करते है। इसके लिये ‘रस’ पद आया है।
इस के विपरीत जिस योगी ने समता को अनुभव किया है, वह संसार के कार्य करते हुये भी प्राप्त विषयों में राग-द्वेष नहीं करते। उनको भोगते नहीं।
स्थितप्रज्ञ की बुद्धि समता में केंद्रित होने के कारण, वह इन्द्रियों के विषय को इन्द्रियों से ग्रहण तो करते है, परन्तु विषय में अनुकूलता-प्रतिकूलता का त्याग विचारपूर्वक कर देते है। वह विषय का कोई महत्व नहीं रखते, उसके प्रति उदासीन रहते है। अतः अन्तःकरण में विषय के प्रति निर्लिप्ता रहती है।
भोगों की सत्ता और महत्ता मानने से अन्तःकरण में भोगों के प्रति एक सूक्षम खिंचाव, प्रियता, मिठास रहती है। इसके कारण मनुष्य अप्राप्त विषयों का चिन्तन करता है और अप्राप्त विषय का भोग, कल्पना में करता है। इस प्रकार मन में विषयों का चिन्तन और भोग रूप से उस विषय का कल्पना में सुख लेना भोग रस है।
जैसे एक रोगी मनुष्य स्वादिष्ट भोजन का सेवन करने में असमर्थ्य होने के कारण कल्पना करता कि जब मैं ठीक हो जाऊँगा तो स्वादिष्ट भोजन का सेवन करूँगा और वह स्वादिष्ट भोजन का रस (आंनद) कल्पना में लेता है।
अतः विषयों का चिन्तन करने से भोग रस बना रहता है और वह भी संस्कार रूप से अन्तःकरण में अंकित होता रहता है।
इस रस (आंनद) का त्याग भोग का त्याग करने से होता है। अतः स्थितप्रज्ञ, प्राप्त पदार्थ को संसार की सेवा में लगा देता है, और उसका भोग नहीं करता।
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