जो साधक तत्व ज्ञान से युक्त हैं, जिसने कर्ता भाव का त्याग कर दिया है, जिसने अहंता का त्याग कर दिया है, जो स्वयं को प्राप्त फल का कारण नहीं मानता, जो फल की कामना नहीं करता, उसके लिये ‘बुद्धियुक्त‘ पद आया है।
पाप-पुण्य पूर्ण कार्य उस व्यक्ति के लिये होते है, जो कार्यों में अहंता करता है। जिसके कार्य कामना पूर्ति के लिये होते है। जो कर्मफल से अपना सम्बन्ध मानता है।
जो बुद्धियुक्त है, वह पाप-पुण्य दोनों प्रकार के कार्यों से मुक्त है। अर्थात वह कर्तव्य के रूप में जो भी कार्य प्राप्त होता है, उसको तत्परता से करता है। परन्तु कार्य और उसके फल के प्रति कोई वृति नहीं होने से, वह पाप-पुण्य से मुक्त है। सुख-दुःख से मुक्त है।
अतः हे अर्जुन तुम बुद्धियुक्त हो जाओ, योग में स्थित हो जाओ और समाज कल्याण के लिये कार्य करो। जो कर्तव्य प्राप्त हुए है, उनको करो।
योग में स्थित हो कर समाज के कल्याण के लिये किये गये कार्य ही उत्तम कार्य है। और उत्तम प्रकार से किये गये कार्य है।
जब मनुष्य, कार्य में कर्ता भाव करता है, स्वयं को प्राप्त फल का कारण मानता है, फल की कामना से कार्य को करता है, तब वह कार्य, पाप-पुण्य रूपी फल देने वाला होता है। अर्थात पाप-पुण्य की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। प्राप्त पदार्थ, परिस्थिति और कार्य से सम्बन्ध मानने से ही पाप-पुण्य का बन्धन होता है।
इसके विपरीत बुद्धियुक्त साधक का सम्बन्ध कार्य और कार्य फल न रहने से, अहंता न होने से, वह संसार के सब कार्य तो करता है, परन्तु वह कार्य उसको पुण्य-पाप रूप से प्रभावित नहीं करते।
अध्याय २ श्लोक ३८ में भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि, अर्जुन तुम जय-पराजय, लाभ-हानि का विचार त्याग कर युद्ध करो। ऐसा करने से तुम पाप को प्राप्त नहीं होंगे। यहाँ जय-पराजय, लाभ-हानि का विचार फल की कामना, फल से सम्बन्ध है। सम्बन्ध का त्याग होने से मनुष्य पाप-पुण्य से रहित हो जाता है।
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