मनुष्य के कार्य, मानसिक एवं शारीरिक, दोनों प्रकार से होते है। साधक को दोनों प्रकार के कार्य तो करने है परन्तु उनके साथ सम्बन्ध नहीं बनाना है। कार्य करते समय इन्द्रियाँ अपना कार्य करेगी, परन्तु अन्तःकरण को उन से लिप्त नहीं होना, आसक्ति नहीं करनी है। भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि इस प्रकार जो साधक राग रहित है, वह योग में स्थित है। ऐसे प्रज्ञावान साधक के निर्णेय तब धर्म संगत होंगे।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण पुनः स्पष्ट करते है कि योग सिद्धि के लिये शरीरक एवं मानसिक कार्यों का त्याग करना नहीं है। त्याग करना है, इन्द्रियों के विषय के प्रति स्थित आसक्ति का, उनके चिन्तन का।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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