श्रीमद भगवद गीता : ६१

अध्याय २ श्लोक ६१

 

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।

वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।२-६१।।

 

सभी इन्द्रियों के विषय में स्थित राग-द्वेष की निवृति के लिये साधक चित को मेरा परायण (ध्यान योग) करके बैठे। क्योंकि जिसका अन्तःकरण संयमित है, राग-द्वेष से रहित है, उसकी विवेकजनित बुद्धि प्रतिष्ठित है। ||२-६१||

 

भावार्थ:

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपना मत प्रस्तुत करते है। वह कहते है कि जिसका अन्तःकरण सयंमित है, और जो समता में स्थिर है, वह ही प्रज्ञावान है। उसकी इन्द्रियाँ ही वश में है और वह ही योग में स्थित है।

अर्थात केवल इन्द्रियों को उनके विषय से हटा लेने से अन्तःकरण में स्थित वृत्तियाँ समाप्त नहीं होती। मनुष्य समता में स्थिर नहीं होता। संसारिक विषयों का त्याग करने से योग की सिद्धि नहीं है।

इन्द्रियाँ वश में करने का तात्पर्य है, की जब इन्द्रियों के विषय समक्ष आये तब अन्तःकरण में वृत्तियाँ उत्पन्न न हो। और वह ही अन्तःकरण का सयंमित होना है।

श्लोक के सन्दर्भ मे:

जब साधक के पास कर्तव्य रूपी एवं जीवन निर्वाह रूपी कोई कार्य न हो, तब उस एकान्त काल में साधक केवल परमात्मा का ही चिन्तन करे। परमात्मा का चिन्तन करने की जो प्रक्रिया है, उसको ध्यान योग कहते है। इस ध्यान योग प्रक्रिया का वर्णन अध्याय ६ श्लोक १० से अध्याय ६ श्लोक २० में हुआ है।

सनातन धर्म पालन हेतु:

इस रस (आंनद) का त्याग, भोग का त्याग करने से होता है। अतः स्थितप्रज्ञ, प्राप्त पदार्थ को संसार की सेवा में लगा देता है, और उसका भोग नहीं करता।

व्यवहार काल में जब साधक इन्द्रयों से विषय को ग्रहण करता है, तब विचार पूर्वक उत्त्पन्न राग-द्वेष के प्रति उदासीन हो जाय और उन विषय में अनुकूलता-प्रतिकूलता का त्याग करे। (अध्याय २ श्लोक ५९)

इस श्लोक से स्पष्ट हो जाता है की निराहारी का बलपूर्वक किया हुआ इन्द्रिय निग्रह क्षणिक है जिससे परमान्द प्राप्ति की कोई आशा नहीं करनी चाहिये।

अतः साधक को:

  • अहंता रहित होकर, प्राप्त कर्तव्य को करना चाहिये।
  • प्राप्त फल का त्याग करना चाहिये।
  • इन्द्रियों के विषय के कारण उत्पन्न होने वाली वृत्तियों को सयंमित करना चाहिये।
  • उत्पन्न होने वाली वृत्तियों के प्रति सतर्क रहना चाहिये।
  • साधना के यह सभी कार्य विचार पूर्व निरन्तर रूप से करने चाहिये।
  • साथ ही साधना धर्य पूर्वक करनी चाहिये।

 

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