इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपना मत प्रस्तुत करते है। वह कहते है कि जिसका अन्तःकरण सयंमित है, और जो समता में स्थिर है, वह ही प्रज्ञावान है। उसकी इन्द्रियाँ ही वश में है और वह ही योग में स्थित है।
अर्थात केवल इन्द्रियों को उनके विषय से हटा लेने से अन्तःकरण में स्थित वृत्तियाँ समाप्त नहीं होती। मनुष्य समता में स्थिर नहीं होता। संसारिक विषयों का त्याग करने से योग की सिद्धि नहीं है।
इन्द्रियाँ वश में करने का तात्पर्य है, की जब इन्द्रियों के विषय समक्ष आये तब अन्तःकरण में वृत्तियाँ उत्पन्न न हो। और वह ही अन्तःकरण का सयंमित होना है।
जब साधक के पास कर्तव्य रूपी एवं जीवन निर्वाह रूपी कोई कार्य न हो, तब उस एकान्त काल में साधक केवल परमात्मा का ही चिन्तन करे। परमात्मा का चिन्तन करने की जो प्रक्रिया है, उसको ध्यान योग कहते है। इस ध्यान योग प्रक्रिया का वर्णन अध्याय ६ श्लोक १० से अध्याय ६ श्लोक २० में हुआ है।
इस रस (आंनद) का त्याग, भोग का त्याग करने से होता है। अतः स्थितप्रज्ञ, प्राप्त पदार्थ को संसार की सेवा में लगा देता है, और उसका भोग नहीं करता।
व्यवहार काल में जब साधक इन्द्रयों से विषय को ग्रहण करता है, तब विचार पूर्वक उत्त्पन्न राग-द्वेष के प्रति उदासीन हो जाय और उन विषय में अनुकूलता-प्रतिकूलता का त्याग करे। (अध्याय २ श्लोक ५९)
इस श्लोक से स्पष्ट हो जाता है की निराहारी का बलपूर्वक किया हुआ इन्द्रिय निग्रह क्षणिक है जिससे परमान्द प्राप्ति की कोई आशा नहीं करनी चाहिये।
अतः साधक को:
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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