योग स्थित प्रज्ञावान साधक का आचरण इस प्रकार का होता है:
मन में कामना उत्पन्न होने पर यथा शक्ति एवं परिस्थिति न होने पर मनुष्य कामना पूर्ति के लिये उद्योग नहीं करता। परन्तु मन में कामना के प्रति स्पृहा बनी रहती है। इस प्रकार कामना पूर्ति के लिये उद्योग न करना कामना का त्याग नहीं है। कारण की मन में तो उसकी चाहा बनी रहती है।
मन में सूक्ष्म रूप से जो कामना के प्रति स्पृहा बनी रहती है, उसको विचार पूर्वक निकाल देना, कामना का त्याग है।
उसी प्रकार कामना पूर्ति के लिये उद्योग करने पर परिस्थिति वश कामना पूर्ण नहीं होती। और तब मनुष्य सन्तोष कर लेता है, और कहता है की मैंने कामना का त्याग कर दिया है। कामना पूर्ण न होने पर सन्तोष करना शुभ भाव है, परन्तु वह कामना का त्याग नहीं है।
ऐसा नहीं की साधक के मन में कामना उत्पन्न नहीं होती। परन्तु विचारशील साधक सत्तर्कता पूर्वक उस उत्पन्न कामना का दमन अन्तःकरण में विचार पूर्वक कर देता है।
मनुष्य का प्राय विचार होता है कि मनुष्य कार्य, कामना की प्रेणना से ही करता है। कामना न हो तो मनुष्य कुछ भी कार्य नहीं करेगा। इस के लिये भगवान श्रीकृष्ण ने अध्याय २ श्लोक ४१ में कहते है कि “हे अर्जुन! तुम केवल समता प्राप्ति की कामना करो”।
क्योकि समता से ही परमानन्द की प्राप्ति है, परमात्मा की प्राप्ति है। इसलिये समता में स्थित होने लिये जो भी योग साधना रूपी कार्य वेदों में कहे गये है, वह सब मनुष्य को करने चाहिये।
अध्याय ३ श्लोक ५ में भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि, मनुष्य किसी भी अवस्था में, क्षणमात्र के लिये भी कार्य किये बिना नहीं रह सकता। अतः विचार केवल इस बात का है कि, कार्य, कामना पूर्ति के लिये हो अथवा कर्तव्यों के लिये?
शरीर के प्रति ममता, अहंता, आसक्ति होने के कारण, मनुष्य शरीर में अनेक प्रकार के कष्टों को अनुभव करता है। परन्तु जब शरीर के प्रति ममता, अहंता, आसक्ति का त्याग होता है, तब शरीर की किसी भी प्रकार की स्थिति क्यों न हो, मनुष्य उस स्थिति से सन्तुष्ट रहता है। किसी प्रकार का कष्ट, दुःख अनुभव नहीं करता।
जिस कारण से भी शरीर को कष्ट है, उस परिस्थिति/कारण के प्रति द्वेष नहीं करता।
शरीर की स्थिति को लेकर सन्तुष्ट रहना ही तपस्या है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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