श्रीमद भगवद गीता : ६९

अध्याय २ श्लोक ६९

 

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।।२-६९।।

 

अन्तःकरण में स्थित समता के अनुभव से जो मनुष्य अज्ञान है, उसके लिये वह अज्ञान रात्री (अंधकार) के समान है। परन्तु संयमी मनुष्य समता में स्थित होने के लिये योग में प्रवृत्त रहता (जागता) है। सधारण प्राणी भोग और संग्रह के लिये कार्य करता (जागता) है। परन्तु मुनि की दृष्टि में यह व्यर्थ (रात) के सामान है।  ||२-६९||

 

भावार्थ:

अध्याय २ श्लोक ६४ में वर्णन हुआ है कि समता में स्थित होने से अन्तःकरण निर्मलता को प्राप्त होता है। निर्मलता प्राप्त होने पर मनुष्य को अनन्य सुख, आनन्द की अनुभूति होती है। जो मनुष्य भोग में आसक्त है, वह इस अनुभूति से वंचित है। संसार के विषयों के प्रति वह इतना आकर्षित हो जाता है, की उसके विवेक पर मूढ़ता रूपी अंधकार छा जाता है। बुद्धि पर अंधकार छा जाने के कारण वह इस आनन्द की कल्पना भी नहीं कर पता।

मूढ़ता रूपी अंधकार के लिये ‘निशा’ पद आया है।

साथ ही इस मूढ़ता के कारण भगवान श्रीकृष्ण मनुष्य को भी पशु-पक्षी की श्रेणी में रखते है। जैसे पशु-पक्षी आदि दिनभर खाने-पीने में ही लगे रहते हैं, ऐसे ही आसक्त मनुष्य दिन-रात खाने-पीने में, आराम में, भोगों और संग्रह में, लगा रहता है। पशु-पक्षी में तो विवेक शक्ति नहीं होती, परन्तु फिर भी वे जितने में पेट भर जाय, उतना ही खाता हैं।

इस के विपरीत मनुष्य (भगवान की कृपा से) में विवेक शक्ति होते हुए भी, वह भोग और संग्रह में लगा रहता है। मनुष्य अपने विवेक का उपयोग अपने और समाज कल्याण के लिये नहीं करता।

इस के विपरीत संसार और अन्तःकरण की निर्मलता को अनुभव करने वाला, मननशील, संयमी साधक की दृष्टि में यह भोग-संग्रह रात के समान है। अर्थात कुछ करने योग्य नहीं है। वह इन विषयों के प्रति उदासीन रहता है।

श्लोक के सन्दर्भ मे:

भोग और संग्रह की वृति के कारण मनुष्य वस्तु का संग्रह करता है – फिर चाहे उसका प्रयोग आज या भविष्य में हो या न हो। भोग-संग्रह में लगा मनुष्य संसारिक कार्यों में बड़े सावधान और निपुण होता हैं। वह एक-एक पैसे का हिसाब रखता हैं, – इतना पैसा तो आ गया इतना लेना है। यह भोग की वस्तु प्राप्त कर ली, और अब यह करनी है। प्राप्त वस्तु कोई दूसरा ना ले ले, इस प्रकार की सतर्कता रहती है। और यही भोगी मनुष्य की जागृत अवस्था है।

अन्तःकरण की निर्मलता से जो अनभिज्ञ है, कर्तव्यों का पालन जिसकी पारमार्थिकता नहीं है, समता प्राप्ति जिसका उद्देश्य नहीं है, विवेक जिसका जागृत नहीं है, ऐसे भोग में लिप्त मनुष्य के लिये जो रात है (कुछ करने योग्य नहीं है), वह संयमी साधक के लिये जागृत अवस्था है। अर्थात उसके सब कार्य कर्तव्य और समता प्राप्ति के उद्देश्य से ही होते है।

सनातन धर्म पालन हेतु:

कर्तव्यों को करना ही मनुष्य का धर्म है- ज्ञान है। केवल स्वयं के लिये करना, भोगों में लिप्त रहना अधर्म है- अज्ञान है।

 

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