जिस प्रकार विभिन्न नदियों का जल विभिन्न दिशाओं से आकर निरन्तर समुद्र में समाता रहता है तथापि समुद्र की मर्यादा किसी प्रकार से भंग नहीं होती।
उसी प्रकार ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से असंख्य विषय संवेदनाएँ संयमी साधक के मन में पहुँचती रहती हैं, फिर भी वे उसके अन्तकरण में किसी प्रकार का भी विकार अथवा क्षोभ उत्पन्न नहीं कर सकतीं।
विषयों के बीच रहता हुआ इन्द्रियों के द्वारा समस्त व्यवहार करता हुआ भी जो स्थितप्रज्ञ स्वस्वरूप की स्थिति से विचलित नहीं होता वही समता युक्त है और वास्तविक शान्ति और आनन्द को प्राप्त है।
जिनके मनमें भोग के लिये पदार्थों की कामना रहती है, जो पदार्थों को ही महत्त्व देते हैं, जिनकी दृष्टि पदार्थों की तरफ ही है, उनको कितने ही सांसारिक भोग पदार्थ मिल जायँ, तब भी उनकी तृप्ति नहीं हो सकती। ऐसे कामनाओं में लिप्त भोगियों को कभी शान्ति नहीं मिलती।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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