श्रीमद भगवद गीता : ५८

अध्याय २ श्लोक ५८ प्रज्ञा – स्थितप्रज्ञ इन्द्रियों के विषय के प्रति उदासीन रहता है

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।२-५८।।

 

जिस तरह कछुआ अपने अङ्गों को सब ओर से समेट लेता है, उसी प्रकार इन्द्रियों के विषय की प्राप्ति होने पर, जिसका अन्तःकरण संयमित रहता है, वह प्रज्ञावान (विवेकजनित) योग में स्थित है। ||२-५८||

 

भावार्थ:

अध्याय २ श्लोक १४ में इन्द्रियों के विषय में अनुकूलता-प्रतिकूलता करने से वे सुख-दुःख देने वाले बताय है। और अध्याय २ श्लोक १५ में इन्द्रियों के विषय में अनुकूलता-प्रतिकूलता का भाव का त्याग करने से, समता का भाव रखने से, विषय सुख-दुःख नहीं देते।

इस से स्पष्ट हो जाता है कि इन्द्रियों के विषय स्वयं से सुख-दुःख नहीं देते, अपितु उनमें अनुकूलता-प्रतिकूलता करने से वह सुख-दुःख देने वाले दिखते है।

अतः इस श्लोक में इन्द्रियों के लिये कछुवा की उपमा ली गयी है।

कछुआ के छः अङ्ग दीखते हैं। चार पैर, एक पूँछ और एक मस्तक। कछुआ इन छे अङ्गों का प्रयोग अपने जीवन यापन के लिये करता है। परन्तु जब कछुए को संकट का आभास है, तब वह अपने अंगों को समेट कर स्वयं को सुरक्षित कर लेता है। साथ ही उसकी यह क्रिया निरन्तर चलता रहता है।

मनुष्य के भी पांच इन्द्रियां और एक मन होता। मनुष्य इनका प्रयोग अपने जीवन यापन के लिये करता है। परन्तु इन इन्द्रियों के विषय के कारण मन में वृत्तियाँ उत्पन्न होती है।

भगवान श्रीकृष्ण कछुए की उपमा दे कर यह बताते है कि मनुष्य के लिये यह वृत्तियाँ संकट के समान है।

जिस प्रकार संकट आने पर कछुआ अपने अंगों को समेट कर स्वयं को सुरक्षित कर लेता है। उसी प्रकार मनुष्य को वृत्ति उत्पन्न होने पर उसको संयमित कर लेना चाहिये। ऐसा करने से मनुष्य वृत्तियों से सुरक्षित हो जाता है।

संयमित करने का अर्थ है विषयों के प्रति उदासीन रहना। अन्तःकरण में उन विषयों के प्रति जिस प्रकार की भी वृत्ति उत्पन्न हो, उसको महत्त्व न देना। विचार पूर्वक उनसे कोई सम्बन्ध न मानना। साथ ही साधक इस कार्य को (संयमित करना) निरन्तर रूप से करता है।

इस प्रकार जो साधक अन्तःकरण को संयमित करने में अभ्यस्त होता है, वह प्रज्ञावान (विवेकजनित) योग में स्थित है।

श्लोक के सन्दर्भ मे:

विषयों के प्रति उदासीनता स्वयं नहीं होती, उसको प्रारंभ में करना पड़ता है। अतः इस के लिये साधक का विवेक जाग्रत रहना चाहिये और निरन्तर सतर्क रहते हुये विचार करके विषयों में महत्व, अनुकूलता-प्रतिकूलता का त्याग करना चाहिये।

केवल इन्द्रियों को विषयों से हटा लेना ही स्थितप्रज्ञ का लक्षण नहीं है, यह स्पष्टता भगवान श्रीकृष्ण अगले श्लोक में करते है।

 

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