अध्याय २ – अर्जुन पर मूढ़ता छा जाने के कारण, अर्जुन युद्ध करने के लिये पूर्ण रूप से इंकार कर देते है। भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष एक विकट परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है। कारण की अर्जुन ने युद्ध का त्याग युद्ध क्षेत्र में युद्ध आरम्भ होने ही वाला था, तब किया। अतः भगवान श्रीकृष्ण का यह प्रयास था की वह अर्जुन को पुनः युद्ध के लिये प्रीरित करे। और यह कार्य शीघ्रता से हो।
जिन-जिन कारणों से अर्जुन में मूढ़ता आई थी, उन सब कारणों का निवारण हेतु तीन प्रकार से अर्जुन को युद्ध करने के लिये प्ररित करने का प्रयत्न करते हैं।
सर्व प्रथम अर्जुन को स्वजनों की मृत्यु का भय था। इसके लिए भगवान श्रीकृष्ण सांख्य विषयक ज्ञान देते है।
दूसरा अर्जुन का भाव था कि युद्ध करने से उसका और उसके कुल के मान, प्रतिष्ठा का हनन होता है। अतः समाजिक दृष्टि से युद्ध करना क्यों आवश्यक है, इस विषय में कहते है।
तीसरा अर्जुन विषाद से भरा था। अतः उस विषाद से मुक्त करने के लिये भगवान् श्रीकृष्ण:
समता क्या है?
समता किस प्रकार प्राप्त की जा सकती है?
कामना उत्पन्न होने का कारण क्या है और उससे मुक्ति किस प्रकार है?
समता प्राप्ति में बाधा क्या है और वह बाधा कितने गहन है?
समता में स्थित होने क्यों अनिवार्य है और उसका क्या लाभ है?
इन सब विषयों पर अपना वक्तव्य रखते है।
।।२-३९।। हे पार्थ! इस प्रकार मैंने तुम्हे अब तक सांख्य विषयक ज्ञान प्रदान किया है। अब तुम बुद्धियोग के विषय में सुनों। बुद्धियोग से युक्त होकर तुम्हारे कर्म, बन्धन से मुक्त हो जाएगे।
।।२-४०।। समता प्राप्ति का प्रयास व्यर्थ नहीं जाता, और इस प्रयास का विपरीत परिणाम नहीं होता। इस धर्म पूर्ण कार्य का अल्प प्रयास महान् भय से रक्षा कर लेता है।
।।२-४१।। हे कुरुनन्दन! समता को धारण करने के विषय पर तुम व्यवसायात्मिका (एक निश्चयात्मक) बुद्धि करो। अन्यथा, मनुष्य की अव्यवसायी बुद्धि में अनन्त कामनायेँ होती हैं और उन कामनाओं की अनेक शाखाएँ होती हैं।
।।२-४२-४३।। हे पार्थ! अल्पबुद्धि-अविवेकी अपनी शोभित वाणी से वर्णन करते है की वेदों में वर्णित यज्ञ विधियों का उद्देश्य, संसारिक विषयों को प्राप्त करना है। ऐसे कामना में तन्मय, जीवन भर उत्तम कर्मफल, भोग, ऐश्वर्य, और स्वर्ग प्राप्ति के लिये अनेक और विविध प्रकार के कार्य करते है।
।।२-४४।। भोग और एश्र्वर्य में आसक्त होकर जिसकी बुद्धि हर ली गयी है, वह व्यवसायात्मिका (निश्चित) बुद्धि में स्थित नहीं हो सकता।
।।२-४५।। हे अर्जुन! वेदों में जो तीन गुणों का वर्णन मिलता है, उस त्रिगुण को तुम अपने आधीन करो। सत-असत के मध्य हो रहे द्वन्द्वों से रहित हो, सत में स्थिर हो जाओं। तुम योगक्षेम का विचार त्याग कर केवल समता को अन्तःकरण में धारण करने के लिये कार्य करो।
।।२-४६।। जिस प्रकार महान् जलाशय के प्राप्त होने पर मनुष्य का छोटे जलाशय में कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता। उसी प्रकार वेद ज्ञाता को परमानन्द (ब्रह्मा) की प्राप्ति होने पर संसारिक भोगों से कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता।
।।२-४७।। कर्तव्य-कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, कर्मफल में कभी नहीं। तुम कर्मफल के हेतु मत बनो और तुम्हारी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो।
।।२-४८।। हे धनंजय! योग में स्थित होने के लिये तुम कार्यों से सम्बन्ध का त्याग करके, कार्यों को करो। तथा कर्मफल की सिद्धि – असिद्धि में समभाव रहो। कारण की समत्व को प्राप्त करना ही योग कहलाता है।
।।२-४९।। इस बुद्धियोग (समता) की अपेक्षा सकाम कर्म अत्यन्त निकृष्ट हैं। हे धनंजय! तुम बुद्धि (तत्व ज्ञान) का आश्रय लो। क्योंकि फल के हेतु बनने वाले अत्यन्त दयनीय हैं।
।।२-५०।। बुद्धि युक्त मनुष्य पाप और पुण्य दोनों प्रकार के कर्मों से मुक्त हो जाता है। इसलिये तुम योग से युक्त हो जाओ। क्योंकि योग युक्त हो कर कर्तव्य करना ही कुशल कार्य है।
।।२-५१।। जब बुद्धियुक्त साधक विचारपूर्वक कर्मों में अहंता एवं प्राप्त फल का त्याग करता है। तब उसका जन्म पाप-पुण्य के बन्धन से मुक्त हो जाता है और वह निर्विकार को प्राप्त होता है।
।।२-५२।। जब तुम्हारी बुद्धि मोहरूपी दलदल को भली भाँति तर जायगी, उसी समय तुम सुने हुए और सुनने में आने वाले भोगों से वैराग्य को प्राप्त हो जाओंगे।
।।२-५३।। जिस काल में अनेक प्रकार के शास्त्रीय मतभेदों से विचलित हुई तुम्हारी बुद्धि समता में अचल और स्थित हो जायेगी, तब तुम (स्थिर बुद्धि) योग को प्राप्त हो जाओगे।
।।२-५४।। अर्जुन ने कहा: हे केशव! समता में स्थित स्थिर बुद्धिवाले साधक के क्या लक्षण होते हैं? वह स्थिर बुद्धिवाला साधक कैसे बोलता है, कैसे बैठता है, और कैसे चलता है? अर्थात व्यवहार करता है?
।।२-५५।। श्री भगवान् ने कहा: हे पार्थ! जिस काल में साधक मन में आयी सम्पूर्ण कामनाओं का भलीभाँति त्याग कर देता है। समता में स्थित, और शरीर से सन्तुष्ट रहता है। उस काल में वह स्थिरबुद्धि कहा जाता है।
।।२-५६।। मुनि, – दुःखों की प्राप्ति होने पर उद्विग्न नहीं होता। सुखों की प्राप्ति होने पर उसके मन में स्पृहा नहीं होती। राग, भय और क्रोध से वह सर्वथा रहित होता है। ऐसे योग स्थित मुनि का मन धीर (शान्त) रहता है।
।।२-५७।। जो साधक सर्वत्र संसार के स्नेह (ममता) से रहित है, वह सब प्रकार के शुभ-अशुभ पदार्थ, प्राणी, परिस्थिति को प्राप्त होने पर, न तो उसका अभिनन्दन करता है, और न ही उसकी उपेक्षा करता है, वह प्रज्ञा (विवेकजनित योगी) प्रतिष्ठित है।
।।२-५८।। जिस तरह कछुआ अपने अङ्गों को सब ओर से समेट लेता है, उसी प्रकार इन्द्रियों के विषय की प्राप्ति होने पर, जिसका अन्तःकरण संयमित रहता है, वह प्रज्ञावान (विवेकजनित) योग में स्थित है।
।।२-५९।। देह में आसक्त, यद्यपि इन्द्रियों को उनके अपने विषय से अलग कर ले, तो भी उसका भोग रस समाप्त नहीं होता। परन्तु जिसने परम तत्व (समता) का अनुभव किया है, उसका भोग रस समाप्त हो जाता है।
।।२-६०।। हे कौन्तेय! भोग रस होने के कारण यत्न करते हुये भी विद्वान् मनुष्य के मन को प्रमथन इन्द्रियाँ बलपूर्वक हर लेती है।
।।२-६१।। सभी इन्द्रियों के विषय में स्थित राग-द्वेष की निवृति के लिये साधक चित को मेरा परायण (ध्यान योग) करके बैठे। क्योंकि जिसका अन्तःकरण संयमित है, राग-द्वेष से रहित है, उसकी विवेकजनित बुद्धि प्रतिष्ठित है।
।।२-६२-६३।। योग – विषयों का चिन्तन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्ति से कामना पैदा होती है। कामना से क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (अविवेक) उत्पन्न हो जाता है। सम्मोह से स्मृति का विभ्रम होता है। स्मृति विभ्रम होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यता नष्ट हो जाती है।
।।२-६४-६५।। जो राग-द्वेष से रहित है, वह इन्द्रियों के द्वारा विषयों का सेवन करता है, परन्तु उसका अन्तःकरण संयमित रहता है। इस प्रकार जिसका अन्तःकरण संयमित है, वह निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। और जिसका अन्तःकरण निर्मल है, उसके सम्पूर्ण दुःखों का नाश हो जाता है। तब प्रसन्नचित साधक की बुद्धि, आकाश की भाँति समता में स्थित हो जाती है।
।।२-६६।। जिसमें समता में स्थित होने की भावना (दृढ़ बुद्धि) नहीं होती, उसका अन्तःकरण समता में स्थित नहीं हो सकता। और जिसका अन्तःकरण समता में स्थिर नहीं है, उसको शान्ति प्राप्त नहीं हो सकती। और जो शान्ति रहित है, वह सुखी कैसे हो सकता है?
।।२-६७।। जिस प्रकार जल में विचरण करने वाली नाव को, वायु का एक तीव्र वेग, अपने पथ से पृथक कर देता है। उसी प्रकार जब इन्द्रियाँ अपने-अपने विषय में विचरण करती है, और मन किसी एक विषय पर आसक्त हो जाता है, तब वह विषय ही मनुष्य की प्रज्ञा का हरण कर लेता है।
।।२-६८।। इस प्रकार हे महाबाहो! शरीरक एवं मानसिक कार्य करते हुए जिस साधक का अन्तःकरण इन्द्रियों के अपने-अपने विषय के राग से रहित है, वह प्रज्ञावान (विवेकजनित बुद्धि) प्रतिष्ठित है।
।।२-६९।। अन्तःकरण में स्थित समता के अनुभव से जो मनुष्य अज्ञान है, उसके लिये वह अज्ञान रात्री (अंधकार) के समान है। परन्तु संयमी मनुष्य समता में स्थित होने के लिये योग में प्रवृत्त रहता (जागता) है। सधारण प्राणी भोग और संग्रह के लिये कार्य करता (जागता) है। परन्तु मुनि की दृष्टि में यह व्यर्थ (रात) के सामान है।
।।२-७०।। जिस प्रकार जल से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में अनेक नदियों का जल उसे विचलित किये बिना समा जाता हैं। वैसे ही संयमी मनुष्य के अन्तःकरण में प्राप्त पदार्थ-परिस्थिति विकार उत्पन्न नहीं करते और योगी परमशान्ति को प्राप्त होता है। भोगों की कामनावाला नहीं।
।।२-७१।।जो योगी सम्पूर्ण कामनाओं और भोगों का त्याग करके अपने कर्तव्यों का पालन करता है, जो स्पृहारहित, ममतारहित और अहंकाररहित है, वह शान्ति को प्राप्त होता है।
।।२-७२।। हे पार्थ! यह योग (ब्राह्मी) स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मृत्यु को लेकर मोहित नहीं होता अर्थात् मोह को प्राप्त नहीं होता। यह स्थिति यदि अन्तकाल में भी स्थित हो जाय, तो मनुष्य शान्त भाव से निर्वाण (भय रहित मृत्यु) को प्राप्त होता है।
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