इन्द्रियगोचर वस्तु को व्यक्त किया जा सकता है। परन्तु परमात्मतत्व इन्द्रियों से परे का विषय होनेके कारण व्यक्त नहीं किया जा सकता।
जो पदार्थ इन्द्रियगोचर होता है वही चिन्तन का विषय होता है। यह परमात्मतत्व इन्द्रियगोचर न होने से अचिन्त्य है।
परमात्मतत्व को अविकारी (विकार-रहित) कहा जाता है अर्थात् इसमें कभी किञ्चिन्मात्र भी परिवर्तन नहीं होता। सबका कारण प्रकृति है और उस कारणभूत प्रकृतिमें भी विकृति होती है। परन्तु परमात्मतत्व में किसी प्रकारकी विकृति नहीं होती; क्योंकि यह कारण सृष्टिसे रहित है।
इसलिये इस देही (परमात्मतत्व) को अच्छेद्य, अशोष्य, नित्य, सनातन, अविकार्य आदि, जान लेने पर शोक हो ही नहीं सकता।
प्रशन:
परमात्मतत्व की वर्णनात्मक परिभाषा नहीं दी जा सकती और परमात्मतत्व इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि से जाना नहीं जा सकता, ऐसा भगवान पूर्व श्लोकों में कह चुके है। तो साधारण मनुष्य को परमात्मतत्व का ज्ञान कैसे हो?
उत्तर:
परमात्मतत्व के ज्ञाता होने की जो प्रक्रिया है, इसको श्रीमद भागवत गीता में विस्तार से कहा गया है। इसको, निश्चय बुद्धि, विज्ञान, विवेक जाग्रति, अभ्यास, भाव में समता, एवं समर्पण के द्वारा, प्राप्त कर्तव्य को करने से, प्राप्त करने की शिक्षा श्रीमद भागवत गीता में दी गयी है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
Read More