भावार्थ:
अध्याय २ श्लोक २६ (पूर्व श्लोक) श्लोक से स्पष्ट होता है कि, जिस शरीर का जन्म होगा, तो उसकी मृत्यु निश्चित है। समय कम-जायदा हो सकता है। कोई भी इस जन्म-मृत्युरूप प्रवाह का परिहार (निवारण) नहीं कर सकता। क्योंकि इसमें किसी का किञ्चिन्मात्र भी वश नहीं चलता। जब प्रकृति की इस प्रक्रिया पर मनुष्य का वश नहीं तो उस प्रक्रिया को स्वीकार कर लेना चाहिये और शोक करना उचित नहीं है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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