जेसा कि पूर्व श्लोक में कहा गया है कि मनुष्य को स्वधर्म का पालन कर्तव्य भाव से समाज कल्याण के लिये करना चाहिए। फिर मनुष्य का जीवन निर्वाह भी तो इसी स्वधर्म से होता है।
भगवान् श्रीकृष्ण कहते है की, जब समाज कल्याण के लिये परिस्थिति ही तुम्हें युद्ध (जो तुम्हारा स्वधर्म है) के लिये प्रेरित करे तो उस से अधिक सुख दायक परिस्थिति तो हो ही नहीं सकती। अतः तुम्हें इस युद्ध से विमुख नहीं होना चाहिये।
अध्याय १ श्लोक ३७ में अर्जुन कहते हैं – युद्ध करके हम सुखी कैसे होंगे? इस के उत्तर में भगवान् कहते हैं – जिन क्षत्रियों को ऐसा धर्ममय युद्ध मिल जाता है, वे क्षत्रिय ही सुखी है।
स्वधर्म कर्तव्य कर्म स्वतः प्राप्त होने से स्वर्ग का दरवाजा खुलने का तातपर्य है – समता और समबुद्धि प्राप्ति के लिय बिना किसी विशेष प्रयत्न के, स्वतः उसकी ओर अग्रसर होना।
अर्जुन और उसके भाइयों (पाण्डव) को राज्य प्राप्त करने की कामना, भोग, इच्छा नहीं थी। इसलिये युद्ध करके वह राज्य प्राप्त करना नहीं चाहते थे। यह युद्ध पाण्डवोँ को परिस्थितिओं के कारण प्राप्त हुआ था। पाण्डव तो जीवन निर्वाह के लिय पांच गांव लेकर भी संतुष्ट थे।
परन्तु दुर्योधन ने सुई के नोक जितनी भूमि देने से इंकार करते हुए सन्धि के लिये दूत बनकर गए हुए भगवान श्रीकृष्ण को बंदी बना लिया। दुर्योधन के राज्य मे समाज और स्त्रियों पर बढ़ते जा रहे थे। इन अत्यचारों की परिकाष्ठा तब हुई जब द्रोपदी का चीर-हरण हुआ है।
समाज में बढ़ते अधर्म को समाप्त करने के लिये माता कुन्ती और भगवान श्रीकृष्ण ने युद्ध करने का निश्चय किया। पाण्डव उनकी आज्ञा का पालन करने हुए युद्ध के लिय तैयार हुए। अतः यह युद्ध समाज कल्याण के लिय अपने-आप प्राप्त हुआ युद्ध था।
अर्जुन क्षत्रिय हैं और क्षत्रिय का ‘स्वधर्म कर्तव्य कर्म’ होता है समाज के कल्याण के लिए कार्य करना और समय आने पर समाज की सुरक्षा के लिये युद्ध करना।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
Read More