अध्याय २ श्लोक ४१ भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि, हे अर्जुन तुम समता प्राप्ति के लिये व्यवसायात्मिका (निश्चित) बुद्धि करो, अन्यथा बुद्धि में अनेक प्रकार की और अनन्त कामनायेँ उत्पन्न होगी।
कामना में तन्मय जिन अल्पबुद्धि मनुष्य का वर्णन पूर्व श्लोक में किया है, उनको ही सम्बोधित इस श्लोक में करते है। जो कामना में तन्मय होकर संसारिक कार्य करते है, उनकी भोग और एश्र्वर्य में आसक्ति बढ़ती जाती और बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। और जिसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, वह समता प्राप्ति के लिये निश्चित बुद्धि करना अति कठिन है।
अतः मनुष्य तत्परता से, सावधान हो कर समता प्राप्ति के लिये व्यवसायात्मिका (निश्चित) बुद्धि करे।
भोग और ऐश्वर्य (संग्रह) की इच्छा ही मनुष्य के कल्याण में बाधा हैं। इसलिये मनुष्य को संसार से जो कुछ सामग्री अथवा परिस्तिथि प्राप्त होती है, वह सब साधन-सामग्री मान कर निष्काम भाव से कर्तव्य मान कर संसार की सेवा में लगा देना चाहिये।
जिस मनुष्य में दुःखी को देखकर हृदय में करुणा पैदा हो जाय, तो उसको विचार होगा कि दुःखी मनुष्य सुखी कैसे हो? ऐसा विचार होने पर मनुष्य संग्रह की हुई वस्तुओं को दुःखी का दुःख दूर करने में लगा देगा और उसमें भोग और संग्रह करने की इच्छा मिटती जायेगी।
जब मनुष्य ईर्ष्या नहीं करता, तब वह अन्य सुखी को प्रसन्न देखकर स्वयं भी प्रसन्न होता है। अन्य के सुख को स्वयं में अनुभव करने से उसको सुख प्राप्त करने की कामना नहीं होती और भोग भोगने की इच्छा भी मिट जाती है। क्योंकि भोग भोगने में जो सुख मिलता है वह सुख दूसरों को सुखी देखकर विशेषता से मिल जाता है और मनुष्य को भोग भोगने की आवश्यकता नहीं रहती।
अतः जो दूसरों के सुख से प्रसन्न (सुखी) होता हैं, तो उसमें ‘भोग’ की इच्छा नहीं रहती और दूसरों के दुःख से करुणित (दुःखी) होने से उसमें ‘संग्रह’ की इच्छा नहीं रहती।
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