श्रीमद भगवद गीता : ५१

अध्याय २ श्लोक ५१

 

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।

जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्।।२-५१।।

 

जब बुद्धियुक्त साधक विचारपूर्वक कर्मों में अहंता एवं प्राप्त फल का त्याग करता है। तब उसका जन्म पाप-पुण्य के बन्धन से मुक्त हो जाता है और वह निर्विकार को प्राप्त होता है। ||२-५१||

 

भावार्थ:

भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि बुद्धियुक्त साधक जब भी कोई कार्य करता है, तब वह विचार पूर्वक कर्त्ता भाव का त्याग करता है। साथ ही वह प्राप्त फल का भी त्याग करता है।

कर्त्ता भाव का त्याग और फल का त्याग पूर्व के श्लोकों में भी कहा है। परन्तु इस श्लोक में अहंता और फल का त्याग किस प्रकार करना है, इसका वर्णन हुआ है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते है की अहंता और फल का त्याग बुद्धि का कार्य है। यह त्याग बुद्धि द्वारा विचार पूर्वक किया जाता है। साथ ही इस त्याग का भाव/विचार बुद्धि में निरन्तर बना रहना चाहिये।

जब भी मनुष्य को किसी कार्य की प्राप्ति होती है, तब मनुष्य के अन्तःकरण में अनेक प्रकार की वृतियां उत्पन्न होती है। परन्तु बुद्धियुक्त साधक इन वृत्तियों के प्रति सतर्क एवं सजग रहता है। साधक इन उत्पन्न वृत्तियों को कोई महत्त्व नहीं देता। कार्य को करने में जो कर्त्ता /अहंता का भाव आता है, उसके विषय में भी ऐसा विचार करता है कि कार्य के होने का कारण परमात्मतत्व है। कार्य परमात्मा के दिये शरीर द्वारा हुआ है। वह स्वयं तो केवल द्रष्टा है, कर्ता नहीं।

इसी के लिये मनीषिणः पद आया है।

साथ ही भगवान श्रीकृष्ण पुनः बल देते है कि कार्यों में कर्त्ता /अहंता का भाव रखने से मनुष्य का जीवन पाप-पुण्य कर्म के बन्धन में बंधता है। मनुष्य के कार्य पाप-पुण्य कर्म के रूप में परिवर्तित हो जाता है।

इस के विपरीत कर्त्ता /अहंता का भाव न रहने से मनुष्य जन्म (जीवन) पाप-पुण्य कर्म के बन्धन से मुक्त हो जाता है। उसके कार्य दोष रहित होते है। अर्थात वह कार्य पाप-पुण्य कर्म नहीं होते।

उसी प्रकार मनुष्य संसार में जब भी कोई कार्य होता है, तो उसके परिणाम स्वरूप परिस्थिति में परिवर्तन अथवा किसी पदार्थ की प्राप्ति निश्चित है। मनुष्य के लिये यह परिस्थिति अथवा पदार्थ फल रूप तभी होती है, जब मनुष्य शरीर (कर्त्ता), कार्य, या प्राप्त परिस्थिति, पदार्थ से सम्बन्ध जोड़ लेता है।

अतः फल का त्याग से तात्पर्य है:

फल की कामना का त्याग।

प्राप्त फल में राग-द्वेष, का त्याग

अनुकूलता-प्रतिकूलता का त्याग।

बुद्धियुक्त साधक प्राप्त फल में उत्पन्न राग-द्वेष, अनुकूलता-प्रतिकूलता के भाव से उदासीन रहता है। उनको कोई महत्त्व नहीं देता।

और तब ऐसी अवस्था में साधक का अन्तःकरण विकार रहित हो जाता है।

 

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