इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण सपष्ट शब्दों में कहते कि समाज में अनेक प्रकार की शास्त्रीय श्रुतिया (धर्म-अधर्म, सत्त-असत्य; पाप-पुण्य, लोक-परलोक, योग विधिः आदि) है, जो मनुष्य को धर्म पूर्ण कार्य करने में विचलित करती है। जिस के कारण मनुष्य अपना कल्याण नहीं कर पता।
अतः हे अर्जुन! तुम इन सब शास्त्रीय श्रुतियों (मतभेदों) से अपनी बुद्धि को निश्चल करो। और केवल योग सिद्धि और समाज कल्याण के लिये बुद्धि को निश्चित करके, अपने कर्तव्यों को करो।
कारण कि जिस समय तुम समता में स्थित हो जाओगे उस समय तुम योग को प्राप्त हो जाओगे।
अर्जुन का मन शास्त्रो के अनेक मतों से विचलित था। वह अपने गुरुजनों, कुटुम्बियों का युद्ध में मारा जाना पाप मानते है और अपने क्षत्रिय धर्म का – (युद्ध करने-) का त्याग करना भी उचित नहीं मानते। इस प्रकार के कई विचारों से अर्जुन की बुद्धि विचलित थी।
सन्सार की भ्रान्तिओं से बुद्धि को निश्चल करना – अर्थात् उन विचारों से विचलित न होना और उनका पूर्णतया त्याग करना। और समता प्राप्ति में बुद्धि को अचल करना – अर्थात् समता प्राप्ति के लिये विचारशील (विचार करते) रहना।
परमात्मा प्राप्ति में बुद्धि को निश्चय कर अपने वर्ण, आश्रम, और परिस्थितिके अनुसार जो वेदों से प्राप्त धर्म रूपी कर्तव्य-कर्म सामने आ जाय, उनको (उस कर्म तथा उसके फल में) कामना, ममता, और आसक्ति का सर्वथा त्याग करके करना ही मनुष्य का धर्म है।
मूलरूप से मनुष्य का धर्म है – प्रकृति और समाज के कल्याण के लिये ही कार्य करना।
योग को प्राप्त होने का अर्थ है परमानन्द की प्राप्ति।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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