इन्द्रियों के विषय में आसक्ति उत्पन्न हो जाने से व्यक्ति की मनुष्यता किस प्रकार से नष्ट हो जाती है, इसका विस्तार से वर्णन, भगवान श्रीकृष्ण अध्याय २ श्लोक ६२ में करते है।
इस श्लोक में जल में नाव, और वायु की उपमा देते हुये भगवान श्रीकृष्ण कहते है की प्रज्ञा का नष्ट होना अत्यन्त ही सरल है।
जब नाव जल में बिना किसी अंकुश के स्वछन्द विचरण करती है, तब वायु का एक तीव्र वेग नाव को, अपनी यथा स्थिति से पृथक ले जाता है। उसी प्रकार साधक कब बिना किसी अंकुश (सतर्कता) के इन्द्रियों को अपने विषय में विचरण करने देता है। तब मन किसी एक विषय में आसक्त हो जाता है। और तब मनुष्य की प्रज्ञा शक्ति नष्ट हो जाती है।
अर्थात् मनुष्य में कर्तव्य-परायणता न रहकर भोगबुद्धि पैदा हो जाती है। भोगबुद्धि होने से मनुष्य में ‘मुझे समता की ही प्राप्ति करनी है’, यह व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं रहती।
जिस प्रकार वायु का वेग दीखता नहीं, उसकी प्रकार विषय में आसक्ति का आभास नहीं होता।
अतः मनुष्य का अपना उद्धेश्य दृढ़ होना चाहिये, कि मुझे तो केवल समता में स्थित रहना है, चाहे जो हो जाय, और विषयों के प्रति सतर्कता भी बनी रहनी चाहिये।
इस प्रकार इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण आग्रह करते है की केवल बुद्धिमान होना पर्याप्त नहीं है, तत्व ज्ञान होना पर्याप्त नहीं है। विवेक की जाग्रति के साथ सतर्कता रखनी भी बहुत आवयशक है।
जब सारे कार्य प्रकृति-समाज हित के लिये होंगे और अपने लिये केवल निर्वह मात्र के लिये होंगे. तब विषयों के प्रति सतर्कता रखने में सहायता होती है।
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